नाम - कलारामजी [कलजी]
जन्म - विक्रम संवत 1832 के आस-पास
पिता - चौधरी मगाराम जी
मां का नाम - माडुदेवी भाकर
पत्नी का नाम - यशोदा देवी डऊकिया खट्टू
व
भुरी देवी सियाग
भाईयो के नाम - जौधाजी,मोडाजी,बागाजी, अजबाजी
बहनों के नाम - मिरो, हिरो,आखा
काका जी का नाम - जैयारामजी खेतासर
जाति - जाट गोत्र - धतरवाल
गांव - खट्टू
मुख्य धाम - खट्टू बालोतरा
गोंगाजी महाराज के परम भक्त जिन्होंने विक्रम संवत 1855के आस-पास ढिकाई मन्दिर के ताले खुलवाए
विक्रम संवत 2080 री साल माघ सुधी बारस ने बुधवार दिनांक = 21.02.2024 को कलाराम जी धतरवाल की स्थापना भोलाराम भाई भोमारामजी द्वारा की गईं !
༺꧁श्री गणेशाय नमः ꧂༻
जय श्री गोगा जी जय श्री भोमिया जी जय श्री कलजी
༺꧁जय श्री दादोसा कलजी꧂༻
विक्रम संवत् 2080 री साल माघ सुधी बारस ने बुधवार दिनांक - 21.02.2024 को कलाराम जी धतरवाल की स्थापना भोलाराम भाई भोमारामजी व दुदाराम, चेतनराम, भिखाराम गंगाराम, चिमाराम, नरपत, मनोहर, पवन व आपरे पुरे परिवार री मौजुदगी में स्थापना करी । स्थापना री टेम मौजुद भोमियाजी सेवक शैरारामजीलौल, रामचन्द जी डऊकिया, जेठाराम जी धतरवाल गोगाजी सेवक रुपाराम धतरवाल पिलानी थान पुजारी, मोडाराम धतरवाल, हिराराम बैनीवाल, हिराराम मैगवाल, नगाराम मैगवाल, खिया बाबा सेवक निम्बाराम धतरवाल व मौजुद लोग सताराम बैनीवाल, आईदान राम बटेर, हरखाराम बैनिवाल, गंगाराम लेगा, खेराजराम जी मेघवाल, देदाराम मेघवाल, भजन गायक प्रकाश खटटु, मुलाराम लोल, व ग्रामवासी मौजूद रहे।
जय श्री गोगाजी जय श्री भोमियाजी जय श्री कलजी
༺꧁श्री गणेशाय नमः ꧂༻
जय श्री गोगाजी जय श्री कलजी जय श्री भोमिया जी
विक्रम संवत 2082 ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष 2 बीज ने बुधवार दिनांक-28.05.2025 को श्री कलारामजी धतरवाल की मुर्ती स्थापना की भोलाराम जी, भोमाराम जी, दुदाराम, भीखाराम,चेतनराम,गंगाराम,चिमाराम, नरपत,मनोहर, पवन, पंकज व कलजी के पुरे परिवार री मोजुदगी में मुर्ती की स्थापना करी !
स्थापना री टेम मौजूद भोमिया सेवक शैराराम/सोनाराम जी लोल, रामचंद्रराम/ मुलाराम जी डऊकिया, आईदानराम/ राजुरामजी बटेर सणपा, पुखराज ब्राम्हण, देदारामजी मेघवाल, खेराजराम मेघवाल, लाधुराम मेघवाल, नगाराम जी मेघवाल, रुपाराम/तुलसाराम जी धतरवाल, मोडाराम/पेमाराम जी धतरवाल, पेमाराम/छैलारामजी प्रजापत, हिराराम/खरथाराम जी बैनिवाल , भोलाराम/भैराराम जी थोरी ,नरसिगारामजी जाखड़, पोलाराम बैनिवाल, मोहनराम जाखड़, अशोक बैनिवाल , भैराराम लोल, खेराजराम/ कोहलाराम जी धतरवाल,भुराराम/रेखारामजी धतरवाल, कुम्भाराम(हुकमाराम)/ पेमाराम जी धतरवाल, नरपत/जेठाराम जी धतरवाल, तगाराम/जैठाराम, व ग्रामवासी मौजूद रहे
कलारामजी धतरवाल का जीवन परिचय
राजस्थान की विर भुमि का इतिहास बहुत प्राचीन है अनेक महापुरुषों, सन्तों, शुरमाओ , भक्तों ने समय-समय पर यहां की पावन धन्य धरा पर जन्म लेकर अपने सद्कर्मों से यहां की माटी को गौरवान्वित किया। उन्हीं में एक महान गोगाजी सेवक कलारामजी थे। जिन्होंने अपने जीवन काल में ऐसे कार्य किए जिसके कारण वे जनमानस में लोकप्रिय हो गए ।
ऐसे महान भक्त पुरुष,लोक जीवन के नायक, आस्था के प्रतिक, कलजी धतरवाल का जन्म बाड़मेर जिले के खटटु गांव में विक्रम संवत 1832के आस-पास चौधरी मगाराम जी धतरवाल के घर हुआ। मां का नाम माडुदेवी भाकर ननिहाल खेतासर
कलजी धतरवाल जब 12 साल के हुए तभी से गोगाजी महाराज की सेवा में लग गए। कई साल बीत जाने के बाद गोगाजी महाराज ने कलजी को मिण धारी रुप में दर्शन दिए और कहा सेवक तेरी भक्ति से मैं प्रसन्न हु जा तु ढीकाई दरबार के दर्शन कर, द्वार तेरे हाथो से खुलवाऊगा।
विक्रम संवत 1855 के लगभग कलजी सुबह उठ कर गोगाजी महाराज की जोत कर अपने साथ छोटा ऊंट का बच्छडा लेकर ढिकाई की तरफ रवाना हुए। रास्ते में कलजी को गोगाजी महाराज की छाया आई और चलते चलते ऊंट के बच्छडे के पैर उखड़ गए । रास्ते में कोई अनजान व्यक्ति आया और ऊंट के बच्छडे को अपने साथ ले गया। कलजी वहां से आगे निकल गए और कलजी ढिकाई पहुंचे तो मन्दिर के द्वार बन्द थे। तो कलजी ने पुजारी जी से कहा मन्दिर के दवार खोलो दर्शन करने है । { पुजारी जी ने पुछा - किया देश रा कहिजो मानवी किया देश सु आया }
{कलजी का जवाब - धोराधरती देश मालाणी कहीजे,गांव खटटुसुआया }
{फिर पुजारी ने पुछा - काई थारो नाम कहिजे, किया देव ने धाया}
{कलजी का जवाब - कलो जाट म्हारो नाम कहिजे,धर्मी राजा ने धाया}
जवाब सुन पुजारी जी ने दर्शन करने के लिए मना कर दिया ।और कहा तु चच्छा सेवक हैं तो परीक्षा लेके देखेगे पुजारियों ने ताजणे उठाए और बोले इस ताजणो से तुझे पिटा जाएगा ताजणो की मार झेल पाया तो ही तुझे दर्शन करवाएगे । कलजी ने कहा दर्शन के लिए मझुर है। तभी पुजारियों ने ताजणे उठाए और जैसे ही कलजी की और बढे तो ताजणो के नाग बन गए और पुजारी ज्यो के त्यो ही रहे ? तब कलजी ने गोगाजी महाराज को याद कर परिक्रमा चालु की और तीन परिक्रमा लगने पर मन्दिर के द्वार अपने आप खुल गए चौथी परिक्रमा देने के बाद कलजी ने मन्दिर की और देखा तो अन्दर साक्षात गोंगाजी महाराज खड़े थे कलजी ने प्रणाम किया तब गोगाजी महाराज ने कहा सेवक वरदान माग। तब कलजी ने कहा आपकी इच्छा । गोगाजी महाराज ने कहा कलजी आप पांच भाई हो और तेरी पांचवीं पीढ़ी में पांच भाई होगे तभी से तेरी सम्तकारी देव के रूप में पुजा चालु होगी । बाद में गोंगाजी महाराज अन्तर ध्यान हो गए । फिर वहां मौजूद लोगों से वार्तालाप चुरु हुई। मौजुद लोगों ने कहा आप हम कृपा करें व आपकी इस कला को समेटे, तभी कलजी ने कहा मैं आप जैसा आप मेरे जैसे यह कळा मेरी नहीं है। यह कला कंवरजी की है मैं और आप सभी कंवरजी के चरणों में पड़े तभी इस कला का समाधान होगा। सभी ने मिलकर कंवरजी महाराज को याद किया और माफी मांगी कंवरजी महाराज ने पुजारी जी को माफ किया ?
तभी कलजी ने कहा मालाणी से आने वाले भक्तों के लिए मन्दिर खुला रखें । बाद में कलजी घर आ गये।